Little Known Facts About पढ़ाई में मन लगये.


की सोच में ज़मीन-आसमान का फ़र्क आ जाता है और फिर मैं कहीं भागा तो नहीं जा रहा था। दारजी तो बस, अड़ गये - तुझे

हूं। - चल तू भी। कहता हूं उससे। - बहुत परेशान हैं, वीरजी ? - कमाल है, यहां मेरी जान पर बन रही है और तू पूछ रही है परेशान हूं। तू ही बता, क्या सही है दारजी और बेबे का ये फैसला.

Don't endeavor to squeeze a square peg right into a spherical gap. If a little something does not fit or it won't feel proper, try a special strategy.

सकता है शाम को तू जब कॉलेज से वापिस आये तो मैं मिलूं ही नहीं तुझे। गुड्डी रोये जा रही है। हिचकियां ले ले कर। उसके लिए और पानी मंगाता हूं, फिर समझाता हूं - तू इस तरह से कमज़ोर पड़ जायेगी

...। हिसाब लगाता हूं दारजी अब पचपन-छप्पन के तो हो ही गये होंगे। अब उमर भी तो हो गयी है। आदमी आखिर सारी ज़िंदगी अपनी

आज दीपावली का त्योहार है। चारों तरफ त्योहार की गहमा-गहमी है। लेकिन मेरे पारसी मकान मालिक इस हंगामे से पूरी तरह

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Reinforcement is simpler in keeping up your motivation than punishment. Depriving your self of points or usually punishing by yourself for failure can do the job in small doses. But, stick with rewards as a substitute when feasible.[19]

लिए एक देखी-भाली शरीफ बहू तो, सच मान गुड्डी, मैं वहीं खड़े-खड़े उनकी पसंद की लड़की से शादी भी कर लेता और अपनी बीवी

) में हिमताराम जी का जन्म यहीं शेरपुरा में हुआ। तब ठाकुर लक्ष्मण सिंह ने शेरपुरा में हँसली कड़े हिमताराम जी को पहनने के लिए चढ़ाये थे।

आने लगा है। दारजी मेरे इस रूप को देख कर हैरान भी हैं और खुश भी। बेबे ने आस-पास के सारे रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों को न्योता भेजा है। वैसे भी अब तक सारे शहर को ही खबर हो ही चुकी

बन्ने खां – जिन दिनों चौधरी साहब राजगढ़ में थे उन्हीं दिनों click here बन्ने खां कस्टम अधीक्षक थे। दोनों सम स्वभाव के थे इसलिए मित्रता कायम हुई।

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और घर के मोह से मुक्त भी हो गया। जिसके लिए जितना बन पड़ा, थोड़ा-बहुत कर भी लिया। बेबे और गुड्डी के ज़रूर अफ़सोस हो

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